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SPOM SET C | Arbitration and Conciliation Act, 1996 | Chapter 3 & 4 | CA Himanshu Adlakha

By CA Himanshu Adlakha · more summaries from this channel

1 hr 39 min video·hi··12418 views

Summary

यह वीडियो मध्यस्थता (arbitration) और सुलह (conciliation) के विभिन्न प्रकारों, उनकी प्रक्रियाओं, विशेषताओं और विदेशी निर्णयों (foreign awards) के प्रवर्तन (enforcement) पर विस्तृत जानकारी प्रदान करता है, जिसमें न्यूयॉर्क और जिनेवा सम्मेलनों के तहत उनके प्रावधानों पर विशेष ध्यान दिया गया है।

Key Points

  • मध्यस्थता के कई प्रकार होते हैं, जैसे एड-हॉक, संस्थागत, घरेलू, अंतर्राष्ट्रीय, संविदात्मक, वैधानिक, फास्ट-ट्रैक और विदेशी मध्यस्थता। 
  • एड-हॉक मध्यस्थता में पक्षकार स्वयं प्रक्रिया तय करते हैं, जबकि संस्थागत मध्यस्थता में एक पेशेवर संस्था नियमों और प्रक्रियाओं का प्रबंधन करती है। 
  • संविदात्मक मध्यस्थता पक्षकारों के समझौते से उत्पन्न होती है, जबकि वैधानिक मध्यस्थता कानून द्वारा अनिवार्य होती है। 
  • घरेलू मध्यस्थता भारत में होती है और भारतीय कानूनों द्वारा शासित होती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता में एक पक्षकार भारत के बाहर का होता है और लागू कानून समझौते या न्यायाधिकरण द्वारा तय होते हैं। 
  • फास्ट-ट्रैक मध्यस्थता का उद्देश्य विवादों को छह महीने के भीतर लिखित रूप में और सीमित सुनवाई के साथ तेजी से हल करना है। 
  • विदेशी मध्यस्थता वह है जहाँ मध्यस्थता की कार्यवाही भारत के बाहर होती है, और इससे प्राप्त निर्णय को विदेशी निर्णय (foreign award) कहा जाता है। 
  • विदेशी निर्णयों का प्रवर्तन न्यूयॉर्क कन्वेंशन के तहत किया जाता है, जिसके लिए कुछ शर्तें (जैसे विदेशी देश में निर्णय, विदेशी कानून, विदेशी पक्षकार) पूरी होनी चाहिए। 
  • न्यायिक प्राधिकरण को वैध मध्यस्थता समझौते और पक्षकार के अनुरोध पर मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजना अनिवार्य है, और कुछ विशिष्ट आधारों पर ही विदेशी निर्णयों के प्रवर्तन से इनकार किया जा सकता है। 
  • सुलह एक स्वैच्छिक और गैर-विरोधात्मक प्रक्रिया है जहाँ एक सुलहकर्ता पक्षकारों को गोपनीय चर्चा के माध्यम से एक समझौते पर पहुँचने में सहायता करता है। 
  • सुलह में, यदि पक्षकार किसी समझौते पर पहुँचते हैं और एक समझौता ज्ञापन (settlement agreement) पर हस्ताक्षर करते हैं, तो वह अंतिम और बाध्यकारी होता है और उसे सिविल कोर्ट की डिक्री के रूप में माना जाता है। 
SPOM SET C | Arbitration and Conciliation Act, 1996 | Chapter 3 & 4 | CA Himanshu Adlakha

SPOM SET C | Arbitration and Conciliation Act, 1996 | Chapter 3 & 4 | CA Himanshu Adlakha

यह वीडियो मध्यस्थता (arbitration) और सुलह (conciliation) के विभिन्न प्रकारों, उनकी प्रक्रियाओं, विशेषताओं और विदेशी निर्णयों (foreign awards) के प्रवर्तन (enforcement) पर विस्तृत जानकारी प्रदान करता है, जिसमें न्यूयॉर्क और जिनेवा सम्मेलनों के तहत उनके प्रावधानों पर विशेष ध्यान दिया गया है।

Key Points

मध्यस्थता के कई प्रकार होते हैं, जैसे एड-हॉक, संस्थागत, घरेलू, अंतर्राष्ट्रीय, संविदात्मक, वैधानिक, फास्ट-ट्रैक और विदेशी मध्यस्थता।
एड-हॉक मध्यस्थता में पक्षकार स्वयं प्रक्रिया तय करते हैं, जबकि संस्थागत मध्यस्थता में एक पेशेवर संस्था नियमों और प्रक्रियाओं का प्रबंधन करती है।
संविदात्मक मध्यस्थता पक्षकारों के समझौते से उत्पन्न होती है, जबकि वैधानिक मध्यस्थता कानून द्वारा अनिवार्य होती है।
घरेलू मध्यस्थता भारत में होती है और भारतीय कानूनों द्वारा शासित होती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता में एक पक्षकार भारत के बाहर का होता है और लागू कानून समझौते या न्यायाधिकरण द्वारा तय होते हैं।
फास्ट-ट्रैक मध्यस्थता का उद्देश्य विवादों को छह महीने के भीतर लिखित रूप में और सीमित सुनवाई के साथ तेजी से हल करना है।
विदेशी मध्यस्थता वह है जहाँ मध्यस्थता की कार्यवाही भारत के बाहर होती है, और इससे प्राप्त निर्णय को विदेशी निर्णय (foreign award) कहा जाता है।
विदेशी निर्णयों का प्रवर्तन न्यूयॉर्क कन्वेंशन के तहत किया जाता है, जिसके लिए कुछ शर्तें (जैसे विदेशी देश में निर्णय, विदेशी कानून, विदेशी पक्षकार) पूरी होनी चाहिए।
न्यायिक प्राधिकरण को वैध मध्यस्थता समझौते और पक्षकार के अनुरोध पर मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजना अनिवार्य है, और कुछ विशिष्ट आधारों पर ही विदेशी निर्णयों के प्रवर्तन से इनकार किया जा सकता है।
सुलह एक स्वैच्छिक और गैर-विरोधात्मक प्रक्रिया है जहाँ एक सुलहकर्ता पक्षकारों को गोपनीय चर्चा के माध्यम से एक समझौते पर पहुँचने में सहायता करता है।
सुलह में, यदि पक्षकार किसी समझौते पर पहुँचते हैं और एक समझौता ज्ञापन (settlement agreement) पर हस्ताक्षर करते हैं, तो वह अंतिम और बाध्यकारी होता है और उसे सिविल कोर्ट की डिक्री के रूप में माना जाता है।
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