Vijayanagar Empire: Complete History through Animation | StudyIQ
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Summary
विजयनगर साम्राज्य की कहानी 14वीं शताब्दी में हरिहर और बुक्का द्वारा इसकी स्थापना से लेकर कृष्णदेव राय के अधीन इसके स्वर्ण युग, अद्वितीय स्थापत्य कला, प्रशासनिक नवाचारों और अंततः 1565 के तालीकोटा युद्ध में इसके पतन तक के 300 वर्षों के गौरवशाली इतिहास को दर्शाती है।
Key Points
- —हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने 1336 में तुंगभद्रा नदी के किनारे विजयनगर नामक एक नए साम्राज्य की स्थापना की।
- —मध्यकालीन भारत में मुस्लिम प्रभुत्व के बीच लगभग 300 वर्षों तक एक बड़े हिंदू साम्राज्य के रूप में विजयनगर का अस्तित्व एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
- —विजयनगर की राजधानी हम्पी, जो आज एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, अपने अद्वितीय स्थापत्य भव्यता के लिए प्रसिद्ध थी, जिसे कई विदेशी यात्रियों ने दुनिया के सबसे बड़े और सुंदर शहरों में से एक बताया।
- —प्रारंभिक शासकों के दौर से ही विजयनगर की बहमनी सल्तनत के साथ तुंगभद्रा दोआब, कृष्णा-गोदावरी डेल्टा और कोंकण क्षेत्र को लेकर एक सदी तक चली प्रतिद्वंद्विता साम्राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती थी।
- —देवराय द्वितीय ने बहमनी सेना की ताकत को समझते हुए अपनी सेना में मुस्लिम तीरंदाजों को शामिल किया और एक मजबूत घुड़सवार सेना का गठन करके सैन्य सुधार किए।
- —विजयनगर स्थापत्य कला में राया गोपुरम, मंडप, रथ गलियां और हम्पी का पत्थर का रथ जैसे अद्वितीय नवाचार शामिल थे, जो साम्राज्य की समृद्धि और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाते हैं।
- —नायंकारा प्रणाली, दिल्ली सल्तनत के इक्ता प्रणाली से प्रेरित एक अद्वितीय राजनीतिक नवाचार था, जिसमें अमरनायक राया की ओर से क्षेत्रों का शासन करते थे और सैन्य सहायता प्रदान करते थे।
- —तुलुवा वंश के कृष्णदेव राय (1509-1529) के शासनकाल को विजयनगर का स्वर्ण युग माना जाता है, जिसमें साम्राज्य सैन्य विजय, समृद्धि, स्थापत्य कला और साहित्य के क्षेत्र में अपनी चरम सीमा पर था।
- —कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संघर्ष और डेक्कनी सुल्तानों के हस्तक्षेप ने साम्राज्य को कमजोर किया, जिसके परिणामस्वरूप 1565 में तालीकोटा के युद्ध में संयुक्त डेक्कनी सल्तनतों ने विजयनगर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
- —तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर की राजधानी पेनुकोंडा स्थानांतरित कर दी गई, लेकिन अमर नायकों के स्वतंत्र राज्यों के उभरने से राया की शक्ति नगण्य हो गई और 1646 में साम्राज्य का आधिकारिक अंत हो गया।
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